आगरा। जिले में गोवंशीय मवेशियों में लंपी स्किन डिजीज के मामले बढ़ने की जानकारी सामने आ रही है। कृषि विज्ञान केंद्र बिचपुरी के पशुपालन विशेषज्ञ धर्वेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, लंपी स्किन डिजीज वायरस से होने वाला विषाणुजनित रोग है। यह मुख्य रूप से मच्छर, मक्खी, चिंचड़ और जूं जैसे रक्त चूसने वाले कीटों तथा संक्रमित पशुओं के संपर्क में आने से फैल सकता है।
उन्होंने बताया कि सीमेन, प्लेसेंटा के साथ दूषित पानी और आहार के जरिए भी संक्रमण फैलने की आशंका रहती है। ऐसे में पशुपालकों को संक्रमित और स्वस्थ मवेशियों को अलग रखने की सलाह दी गई है।
तेज बुखार और शरीर पर गांठें प्रमुख लक्षण
विशेषज्ञ के मुताबिक, लंपी रोग के प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार, आंख और नाक से पानी आना तथा सिर, गर्दन और जननांगों के आसपास कठोर गांठें और सूजन शामिल हैं।
गंभीर मामलों में गांठों में घाव हो सकते हैं। इसके अलावा पशु में कमजोरी, वजन कम होना, दूध उत्पादन में गिरावट, लंगड़ापन, सांस लेने में परेशानी और निमोनिया जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
संक्रमित पशुओं को तुरंत अलग रखने की सलाह
धर्वेंद्र सिंह चौहान ने संक्रमित मवेशियों को स्वस्थ पशुओं से तत्काल अलग रखने की सलाह दी है। बीमार पशु के लिए चारा और पानी की अलग व्यवस्था करने तथा उसके अनावश्यक आवागमन पर रोक लगाने को कहा गया है।
पशुशाला को साफ और सूखा रखने के साथ नियमित रूप से विसंक्रमण करने और मच्छर, मक्खी व चिंचड़ जैसे कीटों पर नियंत्रण रखने की सलाह दी गई है। नए मवेशियों को भी कुछ समय तक अलग रखकर उनकी निगरानी करने की बात कही गई है।
नीम-तुलसी, ग्वारपाठा और हल्दी से जेल का सुझाव
पशुपालन विशेषज्ञ ने त्वचा के घावों की सहायक देखभाल के लिए नीम, तुलसी, ग्वारपाठा और हल्दी से तैयार जेल का सुझाव दिया है। उनके अनुसार, एक लीटर पानी में 400-500 ग्राम नीम और 50-100 ग्राम तुलसी डालकर पानी आधा होने तक उबालना है। ठंडा होने के बाद इसे छानकर इसमें 300-400 ग्राम ग्वारपाठे का गूदा और पांच चम्मच हल्दी मिलाई जा सकती है।
घाव को साफ करने के बाद इस मिश्रण को सुबह-शाम बाहरी रूप से लगाने की सलाह दी गई है। यह केवल सहायक देखभाल के लिए है। गंभीर लक्षण होने पर पशु चिकित्सक से जांच और उचित उपचार कराना जरूरी है।






