सौ बात की एक बात ये कि चीन अब अपनी ट्रेनें आसमान से कंट्रोल करने की प्लैनिंग कर रहा है. आसमान से भी नहीं अंतरिक्ष से. अंतरिक्ष से अपनी ट्रेनें चलाएगा चीन, वहां ऐसी प्लानिंग चल रही. हम वंदे भारत ट्रेनें नए-नए रूट पर, और मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन पर भी काम चल रहा है लोग जानते ही हैं और गर्व भी करते हैं, करना भी चाहिए. लेकिन चीन ने जो रास्ता पकड़ा वो भी देखना चाहिए. इसलिए नहीं कि हमारे यहां क्या कमियां और उनके यहां तो वोट बैंकों की लड़ाइयां नहीं हैं इसलिए वो आगे बढ़ गए. बल्कि इसलिए कि दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ रही है वो जानना भी अपने विकास का एक हिस्सा है. चीन ने दुनिया का सबसे बड़ा हाई-स्पीड रेल नेटवर्क खड़ा कर लिया है. और अभी किया है, 15 साल में 2008 तक चीन का रेलवे नेटवर्क लगभग हमारे जैसा ही था. एक तरह से देखा जाए तो 21वीं सदी में यानी साल 2000 के आसपास से भारत ने हाइवे के ज़रिये विकास की रफ़्तार बढ़ाने की रणनीति पर ज़्यादा ज़ोर दिया, चीन ने हाई-स्पीड ट्रेनों पर ज़ोर देने की रणनीति अपनाई. चीन ने हाइवे भी बनाए लेकिन ज़्यादा फ़ोकस हाई-स्पीड टेनों पर रखा. हमने रेलवे में निवेश किया लेकिन ज़्यादा फ़ोकस हाइवे बनाने पर रखा. तो 2008 तक तो रेलवे नेटवर्क दोनों का लगभग एक जैसा था. लेकिन 2008 से चीन ने हाई-स्पीड ट्रेनों का जाल बिछाना शुरू कर दिया. हाई-स्पीड मतलब वंदे भारत जैसी ट्रेनें नहीं. वंदे भारत तो 160 की स्पीड पर चलती. चीन ने हाई-स्पीड ट्रेनें बनाईं 300-350 km/hr की स्पीड वाली. वो भारत में अभी तक नहीं हैं.
भारत से कैसे बहुत आगे निकला चीन
मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन बन रही है, वो पहली हाई-स्पीड ट्रेन होगी भारत की जब चालू होगी. वो 500 km है, लेकिन चीन 2008 से शुरू कर के 50,000 km का नेटवर्क खड़ा कर चुका है और 2030 तक 60,000 km बना लेने का उसका प्लान है. भारत का तो पूरा रेल नेटवर्क ही 70,000 km का है जबकि चीन 50,000 km तो हाई-स्पीड यानी 300-350 km/hr चलने वाली ट्रेनों का नेटवर्क बना भी चुका है. 2008 में दोनों देश बराबर थेय. लेकिन अब देखिए चीन क्या करने जा रहा है. 350 की स्पीड पर ट्रेनें चलेंगी और कोई गड़बड़ी हो गई सिग्नल की या कोई भी तकनीकी ख़राबी आ जाए या किसी ड्राइवर से चूक हो जाए तो सोचिए ऐक्सिडेंट कितना ख़तरनाक हो सकता है. और चीन में हुआ भी था ऐसा. 15 साल पहले 2011 में वेनचाउ में एक जगह बिजली गिरी और सिग्नल सिस्टम का सर्किट जल गया. दो ट्रेनें एक ही ट्रैक पर आमने सामने आ रही थी, लेकिन सिग्नल जल गया तो एक ट्रेन सिस्टम में नज़र ही नहीं आई और कंट्रोल सेंटर ने गलती से दूसरी ट्रेन को आगे बढ़ा दिया. 300 की स्पीड पर आमने-सामने से दोनों ट्रेनें भिड़ गईं. 40 लोग मर गए, 200 बुरी तरह घायल हो गए थे. चीन ने ढूंढ लिया ट्रेन हादसों को रोकने का तरीका
चीन तब से इसका कोई तरीक़ा ढूंढ रहा था कि ये बुलेट ट्रेनें जैसी ट्रेनें तो चला दीं और पूरा चीन नाप दिया लेकिन इनको चलाने का सिस्टम ऑटोमैटिक कैसे करें? ऐसा सिस्टम हो कि बिना ड्राइवर के ट्रेनें चला सकें और उनके आपस में टकराने का कोई चांस ही ना हो. जैसे मेट्रो में होता है कई शहरों में. ट्रेन ऑटोमैटिक तरीक़े से कंट्रोल रूम से चलती रहती है. लेकिन किसी शहर के मेट्रो में ये करना अलग बात है, बुलेट ट्रेन जैसी 350 की स्पीड पर चीन जैसे बड़े-से देश में ये कैसे कर सकते हैं? तो अब उनके वैज्ञानिकों ने रिसर्च कर के इसका हल निकाला है कि सारी ट्रेनें ज़मीन से कंट्रोल ही ना हों, आसमान से कंट्रोल हों, वो भी अंतरिक्ष से
कैसे अंतरिक्ष से ट्रेन को कंट्रोल करेगा चीन
इसमें क्या होगा कि बहुत सारी लो-ऑर्बिट सैटेलाइटों को ट्रेनों के ‘आंख और कान’ बना दिया जाएगा. लो-ऑर्बिट सैटेलाइट मतलब वो सैटेलाइट जो पृथ्वी के काफ़ी क़रीब अंतरिक्ष में चक्कर लगाती रहती है. जैसे कारों में GPS सिस्टम में जानकारी सैटेलाइट से आती रहती है, या जैसे गूगल मैप्स पर आप फ़ोन पर रास्ता देखते रहते हो, कुछ-कुछ वैसे ही हर ट्रेन से सिग्नल लगातार सैटेलाइट की तरफ़ जाता रहेगा और वहां से सिग्नल आता रहेगा. ट्रेन की लोकेशन और स्पीड हर सेकंड अपडेट होती रहेगी. सैटेलाइट से ये जानकारी जमीन पर ट्रेनों के कंट्रोल सेंटर तक जाएगी. कंट्रोल सेंटर के कंप्यूटर लगातार देखते रहेंगे कि कौन सी ट्रेन कहां पर है और किस स्पीड पर किस ट्रैक पर चल रही है और इस तरह से वो पूरे देश की हर ट्रेन को देखते रहेंगे. और हर ट्रेन को उस हिसाब से सिग्नल जाता रहेगा कि अभी रुकना है क्योंकि आगे दूसरी ट्रेन उस ट्रैक पर आ रही है या अभी फ़ुल स्पीड पर इतने किलोमीटर तक चलते रहना है. पूरे टाइमटेबल के हिसाब से अंतरिक्ष से सारी ट्रेनें कंट्रोल होती रहेंगी, ऐसा सिस्टम बनाया जा रहा है ड्राइवर लेस ट्रेन और मौसम का भी नहीं होगा असर
ये सब कुछ अंतरिक्ष से चलेगा, यानी बादल हों, बाढ़ हो, भूकंप आए, बिजली गिरे, कुछ भी हो ज़मीन के सिग्नल सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ेगा. और आगे चलकर तो फिर ड्राइवर की भी ज़रूरत नहीं होगी. सारी ट्रेनें अंतरिक्ष से ही कंट्रोल होती रहेंगी, बिना आपस में टकराए. ट्रैक पर लगे सिग्नलों की ज़रूरत ही नहीं, रास्ते के स्टेशनों पर लाल झंडी, हरी झंडी का चक्कर ही नहीं. आंधी-तूफ़ान हो, कोहरा हो, बवंडर हो कुछ भी हो. बुलेट ट्रेन जैसी स्पीड वाली ट्रेनों का बादशाह तो बन ही चुका है चीन, अब इस खेल में इतना आगे निकल रहा है कि कोई पकड़ ही ना पाए उसे इस रेस में. चीन की तकनीक से दूसरे देश भी अपना रेल नेटवर्क बना रहे हैं. इंडोनेशिया हो या थाईलैंड हो, और भी कई देश अब रेलवे बनाने में चीन के भरोसे होते जा रहे हैं. इलेक्ट्रिक गाड़ियां हों, इलेक्ट्रॉनिक्स हो, या ट्रेनें हों, चीन ये सब जो विकसित कर रहा है इन सब तकनीकों के ज़रिये दूसरे देशों पर अपना दबदबा भी बढ़ाता जा रहा है. सौ बात की एक बात।



